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*जो दवा के नाम पे जहर दे, उस चारागर की तलाश पूरी : अब देश बंदी की तैयारी

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वे जब भी, जो भी करते हैं, एकदम नया और चौंकाने वाला करते हैं। वे कोई भी रूप धारण कर सकते हैं, किसी भी धजा में हाजिर हो सकते हैं, कहीं भी साष्टांग लम्बलोट हो सकते हैं, मौके-बेमौके हास-परिहास और अट्टहास कर सकते हैं। वे न पहली सदी के रोम के राजा नीरो हैं, न तेरहवीं सदी के तुगलकाबाद वाया दिल्ली के बादशाह मोहम्मद बिन तुगलक हैं और न ही सत्रहवीं सदी की फ़्रांस की साम्राज्ञी मैरी एंटोईनेट हैं। वे इक्कीसवीं सदी के मोदी हैं और अपनी मिसाल आप हैं। नोट बंदी से शुरू की अपनी यात्रा को वे वोट बंदी तक ला चुके हैं : इस बीच में तालियाँ और थालियाँ बजवा चुके हैं, मोमबत्ती जलवा चुके हैं। देश की अर्थव्यवस्था को पटियों पर ला चुके हैं, एक जमाने में जो भारत आधी दुनिया के देशों का स्वाभाविक नेता हुआ करता था, उसे लाइबेरिया की हैसियत में पहुंचा चुके हैं। वे “फकीरे शहर के तन पर लिबास बाकी है/ अमीरे शहर के अरमाँ अभी कहाँ निकले” के भाव से इतने विभोर हैं कि कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहते। यही उत्कट भाव 10 मई को पहले हैदराबाद की आमसभा में प्रकट हुआ और उसके बाद यह साबित करने के लिए कि वह यूं ही अचानक निकल गयी अललटप्पू बात नहीं थी, अगले दिन वड़ोदरा सहित बाकी की सभाओं में भी दोहराया गया।

जैसी कि आशंका थी, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव निबटने के साथ ही सरकार आपदाओं की नयी बौछार लेकर आएगी, वही हुआ भी। मतगणना पूरी होने से पहले ही कमर्शियल गैस सिलेंडर पर लगभग हजार रूपये की बढ़ोत्तरी कर दी गयी और लाखों छोटे दुकानदारों का काम-धंधा मुश्किल में डाल दिया। नई सरकारों के शपथ लेने के पहले ही जनता पर चौतरफा हमलों के नए पैकेज का एलान स्वयं मोदी ने अपने श्रीमुख से कर दिया। ‘संकटों में कर्तव्य सर्वोपरि’ के मन्त्र के साथ आये इस नुस्खे में देश के प्रधानमंत्री ने जनता के लिए कर्तव्यों की जो सप्तपदी गिनाई है, उसमें पेट्रोल-डीजल का संयम से इस्तेमाल करना, बाहर जाना कम करना, सार्वजनिक परिवहन अधिक काम में लाना और कोरोना काल की तरह घर से ही काम — वर्क फ्रॉम होम – करना, एक साल तक शादी-विवाह सहित किसी भी तरह से सोना खरीदना बंद करना, कम से कम एक वर्ष तक विदेश यात्रा पर नहीं जाना, खाने के तेल के उपयोग में भी कमी लाना, खेती किसानी में खाद और उर्वरक का इस्तेमाल कम करना और प्राकृतिक खेती की ओर लौटना, विदेशी सामान नहीं खरीदना, स्वदेशी पर जोर देना आदि-आदि शामिल हैं। कई मायनों में यह बिना किसी महामारी के ही कोविड महामारी के समय उठाये गए कदमों से भी ज्यादा आगे के उपाय हैं। एलान करते ही स्वयं मोदी ही खुलेआम इन सबकी धज्जियां उड़ाने निकल पड़े।

जिस हैदराबाद की सभा में वे पेट्रोल, डीजल की खपत कम करने का निर्देश दे रहे थे, उस सभा के मंच पर वे पूरे 18 किलोमीटर का रोड शो करने के बाद पहुंचे थे और यहाँ घनगरज करने के बाद शाम को सीधे जामनगर पहुंचकर फिर रोड शो किया। अगले दिन 11 मई को सोमनाथ में रोड शो करने के बाद भी मन नहीं भरा, तो शाम को वड़ोदरा में फिर सडकों पर जनता के दर्शनार्थ जनार्दन बन स्वयं खुली झांकी निकाली। प्रधानमंत्री के रोड शो के काफिले में अत्याधुनिक हथियारों से लैस एसपीजी के जवान, जैमर वाहन और एम्बुलेंस सहित 10 से अधिक सुरक्षा वाहन शामिल रहते हैं। इनके अलावा 50 से लेकर 100, कई बार उनसे भी अधिक, कारें होती हैं। यह प्रधानमंत्री के साथ चलने वाले काफिले के वाहनों की संख्या है। इनके अलावा हर 200 मीटर पर खड़ी की गयी सुरक्षा चौकियों के वाहन और वहां खड़े होने वाले सुरक्षा बलों को लाने-ले जाने वाले वाहन अलग से होते हैं। कुल मिलाकर, एक मझोले शहर की कुल तेल खपत से भी ज्यादा तेल एक एक रोड शो में फूंक दिया : वह भी देश भर को कटौती करने के सार्वजनिक रूप से किये गए उपदेश के महज चौबीस घंटों के भीतर ही। संतोष इतने पर भी नहीं हुआ, तो न जाने कितने पुराने सोमनाथ मंदिर की 75वीं वर्षगांठ मना डाली और इस मौके पर सोमनाथ में एयर शो भी करवाया, जिसमें देश की वायुसेना के अतिविशिष्ट माने जाने वाले 6 हॉक एमके विमानों से मंदिर के ऊपर तिरंगे के रंगों का धुआं छोड़ते हुए आसमान में ‘दिल’ की आकृति बनवाई और मंदिर पर फूल बरसवाये। इस आतिशबाजी जैसे नज़ारे का लुत्फ़ लेने के लिए हजारों लोग इकट्ठा किये गए थे और जाहिर है कि वे पाँव-पाँव चलकर नहीं आये थे। पेट्रोलियम उत्पादों की किफायत के अपने ही आह्वान का ऐसा मखौल सिर्फ मोदी नहीं उड़ा रहे थे : उनका पूरा कुनबा इसी में लगा था । कोलकता में बिठाये गए भाजपाई मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने सभी 20 भाजपाई मुख्यमंत्री अपने-अपने हवाई जहाज़ों में लदकर गए थे । कमोबेश ऐसी ही जम्बूरी गुवाहाटी में हिमंता विषसरमा के शपथ ग्रहण के समय हुई। छोटे वाले भी बड़ों से कम नहीं दिखने पर आमादा है : मध्यप्रदेश में एक अदने से पद मप्र पाठ्य पुस्तक निगम के नवनियुक्त अध्यक्ष अपना पदभार ग्रहण करने के लिए उज्जैन से 700 कारों का विशाल काफिला लेकर भोपाल पहुंचे।

इन तमाशों से निबटने के बाद, विदेश यात्राएं न करने की हिदायत देने वाले प्रधानमंत्री जी स्वयं विदेशी तमाशे देखने के लिए 15 मई से 5 देशों — संयुक्त अरब अमीरात, स्वीडन, नीदरलैंड, नॉर्वे और इटली — के भ्रमण के लिए निकल रहे हैं। यह ‘पर उपदेश कुशल’ होने भर का मामला नहीं है। यह उस नए इंडिया का मुजाहिरा है जिसमे संकट का बोझा उठाने का ‘कर्तव्य सर्वोपरि’ नारा सिर्फ जनता के लिए होता है, हुक्मरानों के लिए नहीं। यह पिछले 12 वर्षों में नागरिक को प्रजा में बदलने के तेजी से किये गए प्रयत्नों का अगला चरण है। आम जन के प्रति तिरस्कार और अवज्ञा भाव का भौंडे से और अधिक विद्रूप होते जाना है। मीडिया पर सम्पूर्ण प्रभुत्व कायम करने के बाद किसी भी तरह की आलोचना या समीक्षा या जवाबदेही से अभयदान मिलने के चलते
उपजी निर्लज्जता का चरम है। ढीठता इतनी है कि कल तक खुद किसी तरह की कमी नहीं है, कोई संकट नहीं है, के गाल बजाने के बाद आज अचानक कोरोना जैसे संकट में पहुँच जाने की सफाई भी नहीं दी जा रही। हास्यास्पदता इतनी है कि इधर प्रधानमंत्री कमी की दुहाई दे रहे हैं, उधर उन्हीं के पेट्रोलियम मंत्री पर्याप्त भंडार होने का दावा कर रहे हैं।

पहली बात तो यह कि जिस आपदा की बात की जा रही है, वह आई नहीं है, ट्रम्प की घुड़कियों में आकर बाकायदा बुलाई गयी है। सबसे पुराने और भरोसेमंद देश ईरान से आने वाले तेल को खरीदना बंद किया, जो ईरान से सीधे भारत तक आने वाली पाइप लाइन डाली जाने वाली थी, उसे अधबीच में रोक दिया गया। अगली घुड़की में रूस से मिलने वाले सस्ते तेल की खरीद भी रोक दी। भारत के रासायनिक खाद बनाने वाले कारखानों के लिए अप्रैल में 60,000 टन रूसी तरल गैस — एलएनजी — लेकर आ रहे जहाज को बीच में ही रोक दिया। इधर मोदी किसानों से खाद और उर्वरक का उपयोग कम करने का आह्वान करके उनकी खेती को आदिम युग में पहुंचा रहे हैं, उधर कुनपेंग’ नाम का टैंकर अभी भी समंदर में भटक रहा है। दूसरी और उतनी ही अहम बात तेल के सुरक्षित भंडारण के मामले में अदूरदर्शिता और दिवालियापन की है। दुनिया जानती है कि तेल अर्थव्यवस्था के पहिये को चलाने का सबसे महत्वपूर्ण अवयव है। सारे देश पर्याप्त मात्रा में इसे सहेज कर रखते हैं। चीन के पास लगभग 140 करोड़ बैरल का भण्डार है। यह अमेरिका, जापान और कई यूरोपीय देशों की कुल संयुक्त क्षमता से भी अधिक है। इसमें से लगभग 36 करोड़ बैरल सरकारी और 100 करोड़ बैरल राष्ट्रीय तेल कंपनियों के पास है। इसके बाद अमरीका का नम्बर आता है, जिसके पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा भंडार है, जिसकी क्षमता लगभग 41.3 करोड़ बैरल है। जापान करीब  26.3 करोड़ बैरल के साथ तीसरे स्थान पर है। यूरोपीय देशों के पास कुल मिलाकर लगभग 17.9 करोड़ बैरल का भंडार है। इस सबमें भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, की स्थिति क्या है? उसकी रणनीतिक तेल भंडार क्षमता मात्र 3.91 करोड़ बैरल की है। यह क्षमता दक्षिण कोरिया जैसे देश की 7.9 करोड़ बैरल से आधी से भी कम है। मार्च 2026 की स्थिति में ये भंडार भी लगभग 64% ही भरे हुए हैं। अपनी इस पूरी क्षमता पर, भारत का रणनीतिक रिजर्व केवल लगभग साढे नौ दिनों की राष्ट्रीय खपत को पूरा कर सकता है। पिछले 12 वर्षों में अडानी और अम्बानी इधर तेल खरीद कर उधर दुनिया भर में बेचते रहे, इसके इंतजाम तो किये जाते रहे, मगर देश की अपनी भण्डारण क्षमता बढाने की तरफ ध्यान नहीं दिया गया। यह अनायास हुई चूक या अनदेखी नहीं है – यह कॉर्पोरेट हिमायती नीतियों का नतीजा है। बजाय इसकी जिम्मेदारी लेने के अब सारा बोझ जनता पर लादा जा रहा है।

सभी से घर से काम – वर्क फ्रॉम होम – करने की बात कहकर प्रधानमन्त्री मोदी ने यह साबित कर दिया है कि उन्हें काम क्या होता है, इसका रत्ती भर ज्ञान नहीं है। इस देश का 95 फीसदी से अधिक काम मोबाइल या इन्टरनेट से नहीं सीधे हाथों से औजारों का इस्तेमाल करके किया जाता है। सशरीर उपस्थिति के बिना न उत्पादन संभव है, न किसी भी तरह का निर्माण मुमकिन है। रोजमर्रा की जिन्दगी की जरूरतों के छोटे-छोटे लगने वाले सब्जी, दूध, किराना जैसे काम भी घर बैठे नहीं होते। विडियो कांफ्रेंसिंग और ऑनलाइन मीटिंगों से देश की अर्थव्यवस्थाएं नहीं चलती। मोदी ने कोविड काल का उदाहरण तो दिया, मगर यह बताना भूल गए कि उस दौरान इस देश के करीब 15 करोड़ लोगों का काम-धंधा बंद हुआ था। इनमें से करीब एक-तिहाई का फिर दोबारा कभी शुरू ही नहीं हुआ। अपनी सरकार की अमरीका भीरुता और चौपट विदेश नीति से उपजे संकट से उबरने के लिए वे जिस तरह की दवा लेकर आये हैं, वह बीमारी से भी ज्यादा जानलेवा है। एक साल तक सोना न खरीदने की उनकी ‘सलाह’ अकेले ही देश के 50 लाख लोगों के रोजगार को चौपट करने और सोने के दुकानदारों को कभी न उबर पाने वाले कर्ज के फंदे में जकड़ने की ताब रखती है। इसी तरह की बेतुकी बात किसानों से खाद और उर्वरक का इस्तेमाल बंद कर प्राकृतिक खेती की ओर लौटने की है। इससे जाहिर होता है कि श्रीमान को न तो इस देश की खेती के बारे में कुछ पता है, न ही इन्हें पड़ोसी देश श्रीलंका की प्राकृतिक खेती के ऐसे ही मूर्खतापूर्ण प्रयोग के विनाशकारी परिणामों की याद है।
लेकिन उन्हें यह भी पता है कि उनका सप्तम सुर में दिया नुस्खा एक बहुत बड़े असंतोष को जन्म दे सकता है। इसीलिए वे अंग, बंग, कलिंग, सूर्योदय और पूर्वोदय की तुकबन्दी और मुस्लिम लीग की सरकार में मंत्री रहे श्यामाप्रसाद मुखर्जी के कारनामों की कल्पित कहानियों और साम्प्रदायिक नफरती विषाक्तता से भरे अपने भाषणों में मजदूरों की हड़तालों को कोसना नहीं भूलते। इन हड़तालों से निबटने के लिए इनके नेताओं पर निगाह रखने और ऐसे मामलों में साथ देने के लिए न्यायपालिका तक का आह्वान करते हैं। वामपंथ के खत्म हो जाने का मुगालता पालते हैं।

समस्या की जड़ यह है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री जी ने जब खुद के नॉन-बायोलॉजिकल, मतलब धरा पर सीधे अवतरित होने का एलान किया, तो अनेक दिलजलों ने उनकी बात नहीं मानी। जुर्रत यहाँ तक की कि मजाक उड़ाने का दुस्साहस कर दिया। बस तब से ही, अपनी सारी ऊर्जा लगाकर उसे मनवाने के लिए जुटे हुए हैं। इस मकसद को वे हासिल कर पायें या न कर पायें, एक बात तो उन्होंने साबित कर दी है कि वे अपनी मिसाल आप हैं। वे अपने से पहले के अपनी मिसाल आप कहे और माने जाने वालों – नीरो, तुगलक और मैरी एंटोईनेट — से भी आगे के हैं। उनके परिवर्धित और संवर्धित संस्करण हैं। इन तीनों ने अपने शिगूफों से अपने अपने देशों की जनता का जो कल्याण किया था, वह इतिहास में दर्ज है।

✒️आलेख:-बादल सरोज(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 9425006716)

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