


पिछले साल के शुरू में जब बिहार से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण उर्फ सर की प्रक्रिया शुरू की गयी थी, तभी जनतंत्र की तथा आम जनता के अधिकारों की चिंता करने वाले अनेक संगठनों तथा व्यक्तियों ने, और इनमें विपक्षी राजनीतिक पार्टियां भी शामिल थीं, देश को आगाह किया था कि जिस तरह से इस प्रक्रिया को गढ़ा गया था और विधानसभाई चुनाव से पहले पूरा करने की जल्दबाजी में और इकतरफा फैसलों के जरिए, जिस तरह संचालित किया जा रहा था, वह बड़ी तादाद में लोगों को मताधिकार से वंचित करने का ही साधन बनेगा। इसमें गरीब-गुरबा, सामाजिक रूप से कमजोर, अशिक्षित या कम शिक्षित लोगों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के मताधिकार के लिए खतरे की ओर खास तौर पर ध्यान खींचा गया था।
उसके करीब एक साल बाद, जबकि देश के बड़े हिस्से में, जिसमें विधानसभा चुनाव के मौजूदा चक्र में शामिल राज्य खासतौर पर शामिल हैं और 2024 के आम चुनाव के बाद, सामान्य रूप से अपडेट की गयी मतदाता सूचियों के अनुसार देश के करीब 60 करोड़ मतदाता आते थे, मतदाता सूचियों के शुद्घीकरण के नाम पर करीब 6 करोड़ यानी कुल 10 फीसदी मतदाताओं की छंटनी कर दी गयी है। इस पूरी कसरत का मकसद ही मतदाता सूचियों के शुद्घीकरण के बजाए, मतदाताओं के खासे बड़े हिस्से का बहिष्करण ही होने और देश के वर्तमान सत्ताधिकारियों के राजनीतिक फायदे के लिए मतदाताओं के चुनिंदा हिस्सा का बहिष्करण होने में अगर किसी को संदेह रहा भी होगा तो, पश्चिम बंगाल में एसआइआर की प्रक्रिया के जरिए जिस तरह से 35 लाख लोगों को कम से कम मौजूदा चुनाव में तो मताधिकार से वंचित कर ही दिया गया है, उससे दूर हो जाना चाहिए। जाहिर है कि एसआईआर (सर) की प्रक्रिया के नाम पर चुनाव आयोग द्वारा लाखों लोगों का मताधिकार छीने जाने की वंचना, सुप्रीम कोर्ट के यह कहने से कम नहीं हो जाती है कि वे अगले चुनावों के लिए मतदाता सूची में अपनी जगह बनाए रखने के लिए प्रयास जारी रख सकते हैं!
याद रहे कि मतदाताओं के ऐसे ही बहिष्करण की आशंकाओं को लेकर, अनेक संगठनों तथा व्यक्तियों ने, सर की पूरी प्रक्रिया को ही चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। इस चुनौती में अन्य चीजों के अलावा सर की प्रक्रिया में ढांचागत रूप से ही, मतदाता सूचियों को अद्यतन बनाने के बजाए, एक प्रकार से नये सिरे से मतदाता रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया बना देने और उसके लिए नागरिकता परीक्षण को शर्त बना देेने को चुनौती दी गयी थी, क्योंकि यह सभी संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है। यह दूसरी बात है कि सर्वोच्च न्यायालय ने अब तक इस चुनौती पर तो निर्णय नहीं दिया है, उल्टे अपने अनेक हस्तक्षेपों के जरिए उसने, सर की प्रक्रिया को लागू कराने के लिए सुगमताकारक की ही भूमिका जरूर बड़े उत्साह से संभाली है। प. बंगाल का 34 लाख लोगों का मताधिकार, चुनाव के बाद तक न्यायाधीन बने रहने का भयावह कांड, इसी का नतीजा है।
फिर भी यह कहना पड़ेगा कि बंगाल को यह अनोखा ‘तोहफा’ सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दिया था। यह तोहफा दिया था चुनाव आयोग ने, जिसे बंगाल के मामले में एसआइआर के लिए शेष देश में अपनायी गयी प्रक्रिया के जरिए, पचास लाख से ज्यादा नामों के काटे जाने से संतोष नहीं हुआ था। इसका सीधा-सा कारण विभिन्न स्तरों पर केंद्रीय सत्ता की इस शिकायत में छिपा था कि चूंकि बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में थी, उसने जरूर राज्य कर्मचारी तंत्र से जुड़े बीएलओ आदि को प्रभाव में लेकर, नाम कटने वाले मतदाताओं की संख्या कम करा दी होगी। याद रहे कि बिहार से सर की प्रक्रिया शुरू होने के समय से ही, संघ-भाजपा और उसकी केंद्रीय सत्ता द्वारा इसका प्रचार किया जा रहा था कि, इस छंटनी का असली मकसद बांग्लादेशी घुसपैठियों को मतदाता सूचियों से निकालना था। यह सत्ताधारी संघ-भाजपा के इस आम प्रचार से बखूबी मेल खाता है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में बहुत भारी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिये आकर जम गए हैं। याद रहे कि पिछले साल अप्रैल में पहलगांव के आतंकवादी हमले के बाद, खासतौर पर उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों में, जिसमें राजधानी तथा उसके आस-पास के इलाके खास तौर पर शामिल थे, बांग्लादेशी होने के संदेह के नाम पर, बड़ी संख्या में बंगाली मुसलमानों की पकड़-धकड़ और कहीं-कहीं उन्हें जबरन बांग्लादेश की सीमाओं में धकेलने की मुहिम भी छेड़ी गयी थी। इस पृष्ठभूमि में सर प्रक्रिया से हिंदुत्ववादी ताकतों की कथित घुसपैठिया-विरोधी और वास्तव में मुस्लिम-विरोधी अपेक्षाएं और भी बढ़ गयीं।
बेशक, बिहार में और उसके बाद दूसरे कई राज्यों में भी सर की प्रक्रिया के जरिए, किसी उल्लेखनीय संख्या में घुसपैठियों की पहचान होने की सचाई सामने नहीं आयी। वास्तव में चुनाव आयोग द्वारा सर के नाम पर, 2002-03 की मतदाता सूचियों से संबंध स्थापित करने और विभिन्न दस्तावेजों की मांग के जरिए, एक प्रकार से नागरिकता परीक्षा थोपे जाने के बावजूद, किसी उल्लेखनीय संख्या में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के नाम भी छंटनी में नहीं आ पाए थे। इसके बजाए, गरीबों, अशिक्षितों या कम शिक्षितों तथा महिलाओं के अलावा, बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों पर ही इस छंटनी की गाज गिरी थी, जिनमें, कमाई के लिए अस्थायी रूप से बाहर जाने वाले और इसी तरह बाहर से आकर संबंधित क्षेत्र में रहने वाले मजदूर ही ज्यादा थे। बहरहाल, बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी घुसपैठ के सत्ताधारी संघ-भाजपा के नैरेटिव को और वास्तव में उनके चुनावी हितों को आगे बढ़ाने की चुनाव आयोग की तत्परता में, घुसपैठियों के नहीं मिलने की सचाई से कोई कमी नहीं आयी। उल्टे उसकी यह धारणा और पक्की हो गयी कि बंगाल में और जाहिर है कि असम में भी, बहुत बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम मतदाता सूचियों में होंगे ही।
लेकिन, चूंकि असम में मतदाता सूची में इस तरह की छंटनी सत्ताधारी पार्टी के हित में नहीं बैठती थी और इस राज्य में परिसीमन के जरिए, विधानसभाई सीटों को सत्तापक्ष के हितों के हिसाब से पहले ही ढाला जा चुका था, असम को वहां एनआरसी का मामला लंबित होने का गोलमोल बहाना बनाकर, विधानसभाई चुनाव से पहले सर कराने के तकाजे से अपवाद बनाकर बाहर कर दिया गया। मतदाता सूचियों की इस तरह की सफाई का सारा नज़ला उतरा बंगाल पर। संघ-भाजपा के वैचारिक आख्यान से संचालित चुनाव आयोग के लिए समीकरण आसान था — बंगलाभाषी+मुसलमान = घुसपैठिया! बंगाल के सीमावर्ती जिलों में, इस समीकरण के हिसाब से बीसियों लाख लोग छंटनी के लिए उपलब्ध थे। सत्ताधारी पार्टी की नजरों में ये वैसे भी, उसके विरोधी मतदाता थे। उनका मताधिकार छीना जाना, उसकी जीत में ही मददगार होता।
इसका नतीजा यह हुआ कि इसके बावजूद कि, सर की सामान्य प्रक्रिया में बंगाल में करीब 5 फीसदी नाम कटे थे, जो मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि अनेक राज्यों से ज्यादा ही था, चुनाव आयोग ने बंगाल के लिए एक खास तजुर्बा करना तय किया। इस सामान्य छंटाई के बाद, संशोधित मतदाता सूचियों का और गहन परीक्षण के लिए, एक पूरी तरह के अपरीक्षित साफ्टवेयर के हवाले कर दिया गया, जिसके एल्गोरिदम की न किसी ने जांच की थी और न उसका किसी ने अध्ययन किया था। इस सॉफ्टवेयर ने 1 करोड़ 35 लाख नामों को तार्किक विसंगति या लॉजीकल डिस्क्रीपेंसी की श्रेणी में डाल दिया। बेशक, बाद में उनमें से आधे नामों को इस श्रेणी से निकाल भी दिया गया, लेकिन अमर्त्य सेन से लेकर, पूर्व-जनरलों तक अनेक नामों के मतदाता के रूप में संदिग्ध सूची में डाले जाने का शोर मचने के बाद।
इसके बाद, लाखों लोगों की दस्तावेजों के साथ अंतहीन दौड़ शुरू हुई। अंतत: 35 लाख मतदाताओं का नाम न्यायाधीन की श्रेणी में डाल दिया गया, जिस पर विचार के काम में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, न्यायाधीशों को लगाया गया। और नतीजा क्या निकला? कुल 35 लाख मतदाताओं में से 0.01 फीसद के मताधिकार पर, मतदान के पहले चरण तक न्यायिक ट्रिब्यूनल का फैसला आ पाया था। अधिकांश फैसले प्रार्थियों के मताधिकार के पक्ष में होने से यह भी साफ हो गया कि इनमें अधिकांश वैध मतदाता थे। लेकिन, चुनाव आयोग ने जिस तरह की समय सूची सर के लिए थोपी थी और जिस तरह सोचे-समझे तरीके से और अकारण, लाखों लोगों के मताधिकार पर सवालिया निशान लगाया था, उसने यह सुनिश्चित किया कि मतदाताओं की यह विशाल संख्या अपने मताधिकार का प्रयोग ही नहीं कर सके। बेशक, सुप्रीम कोर्ट ने भी इन मतदाताओं को वर्तमान चुनाव में मतदान का अधिकार देने के बजाए, इस चुनाव को भूलकर आगे अपने मताधिकार के लिए लड़ाई जारी करने का उपदेश देना ही काफी समझा। सर्वोच्च न्यायालय ने तो अपने दरवाजे पर आए, ऐसे 65 चुनाव अधिकारियों को भी कोई राहत देने से इंकार कर दिया, जिन पर चुनाव कराने का जिम्मा तो है, लेकिन जिनका अपना मताधिकार छीन लिया गया है।
कहने की जरूरत नहीं है कि यह पागलपन भी बिना योजना के नहीं है। न्यायाधीन के नाम पर, मताधिकार से वंचित किए गए कुल मतदाताओं में हिंदुओं की संख्या बेशक ज्यादा है, लेकिन आबादी के अनुपात में मुसलमानों का हिस्सा काफी ज्यादा है। इसके ऊपर से मुसलमानों के नामों की छंटनी टार्गेटेड तरीके से की गयी है। एक उदाहरण से ही बात साफ हो जाएगी। मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में एक विधानसभाई क्षेत्र है —शमशेरगंज। इस विधानसभाई क्षेत्र में कुल 2,35,592 मतदाता हैं। इनमें 82 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं यानी 1, 93,129। यहां कुल 1,07,683 मतदाताओं को न्यायाधीन की श्रेणी में डाल दिया गया। इनमें 98.8 फीसदी यानी 1,06,407 मुसलमान हैं, जबकि हिंदू कुल 964 यानी 0.94 फीसदी हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव आयोग का यह फैसला, चुनाव के नतीजों को किस ओर धकेल सकता है।
बंगाल में इस पूरी प्रक्रिया के बीच, छ: लाख नाम मतदाता सूचियों में जोड़े जाने में भी टार्गेटिंग के आरोपों को जोड़ दिया जाए तो, चुनाव प्रक्रिया के ही बनाए जाने की कहानी पूरी हो जाती है। इस सब के बावजूद अगर भाजपा का बंगाल फतेह करने का अभियान नाकाम हो जाता है, तो यह मोदीशाही की जनतंत्र को खोखला करने की वृहत्तर मुहिम के लिए एक बड़ा धक्का होगा और बंगाल की जनता की जीत। लेकिन, इस सब धतकर्म के बाद अगर संघ-भाजपा किसी तरह बंगाल में सत्ता पर काबिज हो जाते हैं, तब भारतीय जनतंत्र के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह और बड़े हो जाएंगे। आखिर, चुनाव आयोग से लेकर न्यायपालिका तक, सब हिंदुत्व की पालकी के कहार बनकर जो खड़े होंगे।
✒️आलेख:-राजेंद्र शर्मा(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)














