


(देशभक्ति, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता)
जिनको महाकवि की उपमा दी गई हैं ऐसे वामनदादा कर्डक के काव्य में राष्ट्रीय चेतना को देखने से पूर्व हमें ‘राष्ट्र’ शब्द का अर्थ तथा राष्ट्रीय चेतना को समझना होगा। ‘राष्ट्र’ शब्द का अर्थ है,”एक जनसमुदाय जिसका भाषा साहित्य,रीति-रिवाज,भले-बुरे की चेतना सामान्य हो और जो भौगौलिक एकता से युक्त प्रदेश में रहता है, राष्ट्र कहलाता हैं।”१
दूसरा अर्थ यह है कि,”राष्ट्र उन लोगों का समूह है जो भाषा, संस्कृति, इतिहास और परंपरा जैसे सामान्य बंधनों को साझा करते हैं। यह पहचान और अपनेपन की भावना है जो व्यक्तियों को एकजुट करतीं हैं। राष्ट्र एक ही देश के भीतर मौजूद हो सकता है या कई देशों में फैले हो सकते हैं।”२
अर्थात् ऐसे लोगों का समूह जो विशिष्ट भूभाग पर एक साथ जुड़कर एकता की भावना से प्रेरित होकर रहते हैं। उनकी परंपरा, भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज और हित समान रूप से होते हैं। उनमें राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं होती हैं। राष्ट्रीय चेतना से तात्पर्य है, जिसमें राष्ट्र के प्रति प्रेम,आत्मियता, समर्पण, बलिदान, अस्मिता की रक्षा, शोषण के प्रति विद्रोह, राष्ट्र का गौरव गान और लोक-मंगल की कामना आदि। एंडरसन के अनुसार “राष्ट्रीय चेतना और अपनेपन की भावना की उत्पत्ति मूलतः प्रिंट पूंजीवाद की प्रधानता से हुई है।”३
इसका उदय उन्नीसवीं सदी के आरंभ में माना जाता है। जहां से आधुनिक काल शुरू होता हैं। और हमारा भारत जब अंग्रेजों के अधिन था। इसी काल में भारतीय लोगों में जनजागृति करने हेतु राष्ट्रीय चेतना का साहित्य लिखा, जिसका आधार भाषा, जाति, धर्म, संस्कृति,भौगौलिक एकता तथा आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक हित था। इस दृष्टि से भारतीय साहित्यकारों ने राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत साहित्य का निर्माण किया। इसमें मैथिलीशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सुभद्रा कुमारी चौहान,दिनकर जैसे अनेक कवियों ने भारतीय आजादी की प्रेरणा अपने काव्य द्वारा दी गई है।
स्वातंत्र्योत्तर काल में देशप्रेम, राष्ट्र की अस्मिता, देशवासियों के प्रति आत्मियता, देश के लिए समर्पण की अभिव्यक्ति सिध्दहस्त महाकवि ‘वामनदादा कर्डक के काव्य में प्रकटता से दृष्टिगोचर होती हैं। उनके ‘बोल उठी हलचल’, ‘दिल्ली दूर नहीं’, ‘जाग उठो’, ‘वामनदादा के हुंकार गीत’ आदि हिंदी काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा मराठी ‘वाटचाल’, ‘मोहळ’, ‘असा हा वामन’ संपादित काव्य संग्रह प्रकाशित हैं। ‘माझ्या जीवनाच गाणं’ आत्मकथा प्रकार हैं। जिसका हिंदी अनुवाद शीघ्र ही न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हो रहा है। वामनदादा कर्डक के जनमानस में फैले हुए चार हजार से भी अधिक संख्या में गीत, कविताएं बिखरे हुए बताये जाते हैं। प्रा.सागर जाधव जी ने इसे सोलह खंडों में प्रकाशित करने का कार्य कर रहे हैं। इसमें दो खंड हिंदी काव्य गीतों के हैं। इनके काव्य पर अनेक आलोचनात्मक ग्रंथ भी प्रकाशित हुए हैं। एक एमफिल और दो पीएचडी का अनुसंधान कार्य हो चुका है। सोलापुर विश्वविद्यालय में एक हिंदी में पीएचडी का अनुसंधान कार्य शुरू हैं।
वामनदा कर्डक के काव्य का अवलोकन करने पर देशप्रेम की अभिव्यक्ति प्रकट रूप में दिखाई देती हैं। ‘वतन के लिए’ कविता में अपने देश और समाज के लिए त्याग, बलिदान और सर्वस्व समर्पण का भाव प्रकट होता हैं,
“तन है मेरा वतन के लिए,
मन है निले रतन के लिए।
जिंदगी दान देते हुए,
दे दूं उजड़े चमन के लिए।
रोकना छोड वामन मुझे,
मैं तो निकला हूं रण के लिए।
तू तो फनकार भी न बना,
एक अच्छे फन के लिए।”४
डॉ.अशोक जोंधळेजी इस संदर्भ में लिखते हैं, “वामनदादा कर्डक उच्च कोटि के सच्चे कलाकार थें। आप समाज के भक्त तो थें और एक सच्चे राष्ट्रभक्त भी थेंं। राष्ट्रीयता की भावना आपके गीतों में अभिव्यक्त हुई हैं।”५
‘हकदार’ कविता में वमनदादा कर्डक देश कि बहुजन पिछड़े वर्ग के हक की बात पुरजोर तरीके से प्रकट करते हैं। जो लोग देश के वतनदार होकर भी गरीब, बेघर, मतदाता हैं। उनको भी चुनाव लड़ने, सरकार बनाने और चलाने का अधिकार हैं। यहां कवि देश की आम अवाम के अधिकार की बात करते हैं। वे कहते हैं,”देश के लोग यहां देश के हकदार बने।
देश के धनी बने देश के सरदार बने।।”६
हमारे देश की आजादी को पचहत्तर साल हो चुके हैं। हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं किंतु हमें आज भी यह सवाल सताता है कि, क्या हम सचमुच आजाद हुए हैं? क्या हमारे देश में लोकतंत्र है? क्या हमारे देश में संविधान का सही-सही अमल किया जाता हैं? और अगर ऐसा नहीं है तो हमारे देश में आज भी अशिक्षा, अज्ञान, अंधविश्वास, गरीबी, बेकारी, विषमता, शोषण, जाति भेद, धर्मांधता, ज़ुल्म, अन्याय-अत्याचार जैसी समस्याएं जस-की-तस हैं। इसलिए वामनदादा कर्डक हमारे देश में वास्तविक जनतंत्र की सरकार लाने के लिए कटिबद्ध हैं। कवि उसके लिए सर्वस्व समर्पण की भावना व्यक्त करते हैं। अपनी ‘दिल्ली दूर नहीं’ कविता में वे कहते हैं,
“नए शासन के लिए दिल्ली दूर नहीं।
नये आसन के लिए दिल्ली दूर नहीं।।”७
देश में बसने वाले सभी वर्गों-अमीर-गरीब, किसान,धनवान लोगों से वामनदादा अगाज करते हैं कि देश और समाज के लिए अपने खून पसीने से कमाया हुआ अनाज,धन और बल सब कुछ देश के लिए समर्पित कर दो। देश के युवाओं में देशप्रेम की स्फूर्ति का संचार भरने काम करते हैं। कवि हमें राष्ट्र के लिए बलिदान देने वाले राजपूत राणा रणजीत सिंह, गुरू गोविंद सिंह, बाजी प्रभु और छत्रपति शिवाजी जैसे शूरवीर योद्धाओं का स्मरण दिलाते हुए कहते हैं,
“जवानों तनबदन और मन,वतन के वास्ते दे दो।
किसानों अन्न का कण-कण, वतन के वास्ते दे दो।।
अमीरों तुम तुम्हारा धन, वतन के वास्ते दे दो।
छिपाना छोड़ दो कंचन, वतन के वास्ते दे दो।।
खजाना खोल सब धन,वतन के वास्ते दे दो..
यहां फिर से कोई रजपूत राणाजी सा पैदा हो।
गुरु गोविंदजी, रणजीतजी गाजी सा पैदा हो।।
अकेला हो हजारों में बाजीप्रभुजीसा पैदा हो।
वतन पे फ़िदा नरवीर नेताजी सा पैदा हो।।
शिवाजी बनके तुम दर्शन वतन के वास्ते दे दो.”८
वामनदादा कर्डकजी अपने समय में राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले आर्थिक बदलाव की ओर भी बड़ी संजीदगी से पाठकों का अवधान खींचते हैं। इस दृष्टि से उनकी ‘डंकल’ और ‘भारत का कानून’ कविताएं बहुत महत्वपूर्ण हैं। पी.व्ही.नरसिंहराव सरकार द्वारा लाए गए ‘डंकल’ प्रस्ताव का भारतीय अर्थव्यवस्था तथा समाज पर पड़ने वाले दुष्परिणामों को देखते हुए उसका पुरजोर तरीके से विरोध प्रकट किया गया। भारत की ‘नीजिकरण उदात्तिकरण और वैश्विकरण’ की इस अर्थ नीति का जन-सामान्य समूह मजदूर, किसान और भारतीय लघु उद्योग-व्यवसायिकों पर गिरनेवाली इस गाज के दुष्प्रभावों को बडी संजीदगी एवं मार्मिक ढंग से इन कविताओं में चित्रित किया गया हैं। जैसे-
“भारत का कानून जलेगा भारत में,
डंकल का कानून चलेगा भारत में।
देशी मजदूरों के खून पसीने से,
परदेशी परिवार पलेगा भारत में।।”९
साहित्य रत्न अण्णाभाऊ साठे जी ने कहा था ‘यह है आजादी झूठी है देश की जनता भूखी है।’ दुष्यंत कुमार जी ने भी कहा,’कहा तो तय था चिराग हर घर के लिए है। कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।।’ यही बात वामनदादा कर्डकजी ने कही,
“हमारी आजादी की बात यहां बाकी है;
हाल-ए जिंदगी की बात यहां बाकी है।
देश के दलालों से और ठेकेदारों से;
जिगर से लड़ने वालों की जात यहां बाकी है।।”१०
अर्थात कवि का मानना है कि सही मायने में हमें आजादी तभी मिलेगी जब इस देश के हर नागरिक को सुख सुविधाएं उपलब्ध होंगी। क्योंकि हमारे देश को आजादी तो मिल गई किन्तु यहां आज भी करोड़ों लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार,आवास, बिजली, पानी, सड़कें,आदि सुविधाएं हमारी सरकार उपलब्ध नहीं करा पाई हैं। कुछ मुफ्त की रेवड़ी योजनाएं मात्र चुनाव को मद्देनजर रखते हुए मुहैया कराई जाती हैं। भ्रष्टाचार ने भारतीय दफ्तरशाही को घुन की तरह खोखला कर दिया है। देश की आजादी से भी अधिक देश में रहने वाले बहुजन पीछडे लोगों की मानवीय स्वतंत्रता की आवश्यकता हैं। इसलिए वामनदादा लिखते है,
“देश की आजादी का, देश को फल ना मिला।
फल से आजादी का, देश को बल न मिला।। वहां तो फल भी मिला, वहां तो बल भी मिला।
गरीब गांव को, ये जरा-सा बल न मिला।।”११
समकालीन समय में कुछ हद तक सौर ऊर्जा नागरिकों एवं किसानों के लिए कुछ स्वयं अर्थ तथा कुछ शासकीय अनुदान से बल प्रदान करने की कोशिश की जा रही हैं। गरीब लोगों को आवास और छोटे किसानों को बावड़ियों, सिंचाई के साधन प्रदान किए जा रहे हैं किंतु इसमें भी भ्रष्टाचार तथा घुस के मामले सामने आ रहे हैं।
कवि को पूरा आत्मविश्वास है कि आमजनों की भलाई की सरकार बनेगी। उस तरह के आसार भी उनको दिखाई देने लगे हैं। आज नहीं तो कल एक न एक दिन देश का सारा माहौल बदल जाएगा। देश को लुटने वाले, ग़रीबों का हक़ छीनने वाले इस देश की सियासत से बाहर कर दिए जाएंगे। इसलिए वामनदादा कर्डक ‘बोल उठी हलचल’ कविता में लिखते हैं,
“बोल उठी है हलचल,जमाना बदलेगा।
आज नहीं तो कल, जमाना बदलेगा।।
नहीं चलेगा जोर यहां, धन चोरों का।
धीरे से आज यहां कमज़ोरों का।।
बढ आएगा बल…आज..”१२
अंत में कवि अपने देश के साथ ही विश्व शांति की कामना करते हैं। दूसरे विश्व महायुद्ध से जो तबाही हमनें देखी उससे भी वर्चस्ववादी राष्ट्रों ने सबक नहीं सीखा है। वर्तमान में चल रहें रूस-नाटो-यूक्रेन, इजरायल-इरान, चीन-उत्तर कोरिया और अमरीका का युद्ध अपने अपने प्रभुत्व को बनाए रखने की होड में हजारों बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतारा गया हैं और जा रहा है। अतः इस समस्या का एक मात्र समाधान वामनदादा बुद्ध को स्वीकार करने और उनके तत्वों को अंगिकार करने की सलाह देते हैं। ‘ना तोपों की जरूरत’ कविता में वे कहते हैं,
“ना तोपों की जरूरत है,ना तो बम की जरूरत है।
संसार को न ज़ुल्म और सितम की जरूरत है।।
ना खून की रंगोली उस कलम की जरूरत है।
जिसमें जलें जहां ना एटम की जरूरत है।।
सच बोले तो इस धरती को गौतम की जरूरत है।”१३
निष्कर्ष रूप में हम यह कह सकते हैं कि, महाकवि वामनदादा कर्डक के काव्य में राष्ट्रीय चेतना कुट-कुट कर भरी हुई हैं। इसलिए वामनदादा कर्डकजी का हिंदी काव्य में अनन्य साधारण महत्व हैं।
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संदर्भ संकेत:
१.अंतरताना से
२.अंतरताना से
३.अंतरताना से
४.जाग उठो-संपा.डॉ.अशोक जोंधळे,(पृ.३९,४०)साहित्यायन पब्लिशर एवं लायब्रेरी बुक सप्लायर, कानपुर (सं.२०१५)
५.वही.(पृ.४०)
६.दिल्ली दूर नहीं-संपा.प्रा.अजय जोंधळे (पृ.२०) प्रतिभास प्रकाशन, परभणी (सं.२००७)
७.वही.(पृ.१५)
८.बोल उठी हलचल-संपा.रविचंद्र हडसनकर (पृ.६३)शब्ददान प्रकाशन, नांदेड़(सं.२००५)
९.वही.(पृ.१४)
१०.वामदादा के हुंकार गीत-संपा.ज.मा.तांदले (पृ.२३)प्र.आंबेडकर मिशन, पटना-२(२०१६)
११.वही.(पृ.११)
१२.बोल उठी हलचल-संपा.प्रा.रविचंद्र हडसनकर(पृ.०९) शब्ददान प्रकाशन, नांदेड़(संत.२००५)
१३.वही.(पृ.७९)

प्रो.डॉ.एम.डी इंगोले
(हिंदी विभागाध्यक्ष तथा शोध निर्देशक) कला, वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय, गंगाखेड जि. परभणी -४३१५१४(महाराष्ट्र)
मो-9970721935 ईमेल:ingolemunjaji@gmail.com














