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अपनी बुध्दि को सन्मार्ग की ओर ले जाने का प्रयास करें।-पुरुषोत्तम सहस्त्रनाम स्तोत्रम् ग्रंथ पर मुरलीमनोहर व्यास का चिंतन

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चंद्रपूर – मानवी देह में रहनेवाली बूद्धि बहुरुपिणी अर्थात अनेक रुप धारण करने वाली सतत नवनविन कामनायें करनेवाली स्त्री है। जो कभी संतुष्ट ही नही होती। इस का पति यह जीव है।अगर यह जीव बुद्धि को नियंत्रीत करना चाहे तो उसे शास्त्रों का अध्ययन और सद्गुरु की शरण लिये बगैर अन्य कोई साधन नही है। अपने आराध्य प्रभु के सतत नाम संकीर्तन से अपनी देह और बुद्धि को सन्मार्ग में लगा सकते है। अत: संत सद्गुरु के सानिध्य में रहकर सबके प्रति सतत मंगल विचार रखने चाहिए। और अपनी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर ले जाने का प्रयास करना चाहिए ऐसे विचार चंद्रपुर के आध्यात्मिक चिंतक तथा साहित्यकार मुरलीमनोहर व्यास ने प्रतिपादित किये।
श्री गोवर्धननाथ हवेली चंद्रपुर में जगद्गुरु श्रीमद् वल्लभाचार्यजी द्वारा रचित श्री पुरुषोत्तम सहस्त्रनाम स्तोत्रम् ग्रंथ का विश्लेषण करते हुये मुरलीमनोहर व्यासजी 15 फरवरी को बोल रहे थे।
व्यासजी ने कहा वल्लभाचार्यजी ने श्रीमद् भागवत ग्रंथ में भगवान का एक नाम वर्णित किया है, गुढवाक्यार्थज्ञापनक्षम: अर्थात गुढ वाक्यों के अर्थ समझाने में समर्थ। महर्षि नारदजी ने दक्ष प्रजापति के हर्यश्व पुत्रों को प्रभु की प्रेरणा से कुछ गुढ प्रश्न पुछे। उन्होंने सही उत्तर दिये। नारदजी ने कहा तुम्हें बहुत ज्ञान है , संसार में पडने के बजाय प्रभु भक्ति करके प्रभु में ही विलीन हो जाओ।
नारदजी ने पुछे सवाल जवाब इस प्रकार है, एक ऐसा देश है, थे
जिसमें एक ही पुरुष है। अर्थात हमारा शरीर। एक ऐसी गुफा जिसमें से निकलने का रास्ता नही है। अर्थात यह ब्रह्मांड।एक बहुरुपिणी स्त्री अर्थात हमारी बुद्धि । एक ऐसा पुरुष जो व्यभिचारिणी का पति है, अर्थात विविध कामनाओंवाला जीव। एक ऐसी नदी जो दोनों ओर बहती है, अर्थात माया। एक विचित्र मकान जो पचीसों वस्तुओं से निर्मित है, अर्थात हमारा शरीर। एक ऐसा हंस जिसकी बातें विचित्र लगती है, अर्थात शास्त्र तथा सद्गुरु। एक ऐसा चक्र जो सतत घुमता रहता है, अर्थात कालचक्र। ऐसे प्रश्नोत्तरों से ज्ञान देकर उन पर प्रभु ने कृपा ही की। इसी लिए प्रभु को गुढार्थज्ञापन: कहा गया है। दक्ष प्रजापति के पुत्रों को भगवान ने मोक्ष रुप आनंद प्रदान किया अत: प्रभु को सर्वमोक्षानन्दप्रतिष्ठित: नाम से अलंकृत किया गया है।
प्रारंभ में वैष्णव महिला मंडल द्वारा श्री यमुनाष्टकम् के पाठ तथा श्री सर्वोत्तमजी के पाठ किये । सत्संग पश्चात श्रीकृष्ण नाम संकीर्तन किया गया। मुखियाजी कुलदीप शर्मा ने श्री गोवर्धननाथ प्रभु की आरती उतारी।

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