



चंद्रपूर – जो व्यक्ति शुद्ध बुद्धिवाला होता है, सभी के प्रति समभाववाला होता है, प्रभु के प्रति समर्पित होता है, ऐसे व्यक्ति भगवान के ह्रृदय के भावों को जानते है। प्रभु जो भी करेंगे सही करेंगे।जो हुवा अच्छा हुवा , यह भाव हमारा होना चाहिए। ऐसे विचार चंद्रपुर के आध्यात्मिक चिंतक तथा साहित्यकार मुरलीमनोहर व्यास ने प्रतिपादित किये।
श्री गोवर्धननाथ हवेली चंद्रपुर में दि 8 फरवरी को एकादशी सत्संग समारोह में आप बोल रहे थे। प्रत्येक एकादशी को संध्या शयन दर्शनों में 5-30 बजे से व्यासजी का सत्संग तथा श्रीकृष्ण नाम संकीर्तन होता है। पहले श्री वैष्णव महिला मंडल द्वारा यमुनाष्टक के पाठ किये जाते है।
पुष्टिमार्ग के प्रणेता जगद्गुरु श्रीमद् वल्लभाचार्यजी ने श्रीमद् भागवत ग्रंथ में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण के विविध कार्यों पर आधारित सहस्त्रनामों के ग्रंथ श्री पुरुषोत्तम सहस्त्रनाम स्तोत्रम् ग्रंथ की रचना की। इन नामों के भावार्थों का विश्लेषण व्यासजी कर रहे हैं।
व्यासजी ने कहा नारदजी ने भगवान के ह्रृदय के भावों को जानकर दक्ष प्रजापति के पुत्रों को संसार से मुक्त कर प्रभु भक्ति में प्रेरित कर दिया अत: भगवान का नाम दासैकज्ञातहृदगत: हुवा।
भगवान ने दक्ष के पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया। संसार के बंधन में आनंद नही, संसार के बंधन से मुक्त होने में ही आनंद होता है।अत: भगवान श्रीकृष्ण को सर्वमोक्षानन्दप्रतिष्ठित: कहा है।
व्यासजी ने कहा श्रीमद् वल्लभाचार्यजी कहते है, घर – संसार छोडने की आवश्यकता नही है, अपितु संसार में रहकर संसार के मोह बंधन से अलिप्त रहना चाहिए , वर्तमान में जीना चाहिए। प्राप्त में संतुष्ट रहने वाला सुखी रहता है। हमारे मन में अनेक कामनायें, इच्छायें भरी रहती । हमारा तन भगवान के समक्ष रहता है, लेकिन मन संसारिक मोह बंधनों में भटकता रहता है। पूर्ण तन्मयता के साथ भक्ति करने वाले भक्तों पर कृपा करके भगवान मन को स्थिर करके भक्त पर कृपा करते हैं। मन संसार के बंधन से मुक्त होता है अद्भुत आनंद प्राप्त होता है।
संध्या शयन के दर्शन में बसंत के पदों का गायन व्यासजी ने किया। मुखियाजी कुलदीप शर्मा ने आरती उतारी।













