Home चंद्रपूर पिज्जा बर्गर संस्कृति बढने से पंचकर्म चिकित्सा आवश्यक-श्री साई पालिटेक्निक चंद्रपुर के...

पिज्जा बर्गर संस्कृति बढने से पंचकर्म चिकित्सा आवश्यक-श्री साई पालिटेक्निक चंद्रपुर के डी एम एल टी विभाग में मुरलीमनोहर व्यास का पंचकर्म चिकित्सा पर प्रतिपादन

268

✒️रोशन मदनकर(उप संपादक)

 चंद्रपूर(दि.4फेब्रुवारी):-आज हमारा आहार और विहार अनियंत्रित हो गया है। पिज्जा, बर्गर, वडा पाव, मैगी जैसे पदार्थों का प्रचन बढ गया है। जिससे बडे – बुढे ही नही बच्चे और युवाओं की भी पाचन क्रिया प्रभावित होकर विविध रोगों का संक्रमण बढने के कारण आयुर्वेद की पंचकर्म चिकित्सा आवश्यक होती जा रही है । पंचकर्म से अंतडियोंमें जमा विषाक्त अन्न कणों को वमन, विरेचन आदि क्रियाओं से बाहर निकालना पड़ता है। इससे बचने के लिए अपने आहार विहार पर ध्यान देना चाहिए। पंचकर्म चिकित्सा से शरिर की अंतर शुद्धि के साथ ही मन की शुद्धि भी होती है। इन शब्दों में मुरलीमनोहर व्यास ने छात्रों को पंचकर्म चिकित्सा का ज्ञान दिया।

    चंद्रपुर के श्री साई पोलिटेक्निक के डी एम एल टी अभ्यासक्रम के छात्रों के लिए अतिथी व्याख्याता के रूप में पंचकर्म चिकित्सा विषय पर आयुर्वेद के अभ्यासक मुरलीमनोहर व्यास का विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। 

     छात्र – छात्राओं से खचाखच भरे सभागृह में एक घंटे तक छात्र पूर्ण तन्मयता से व्याख्यान श्रवण करते रहे।

     प्रारंभ में प्रा एस एन निखाडे ने प्रास्ताविक किया और व्यासजी का परिचय दिया। डी एम एल टी विभाग प्रमुख प्रा जे बी भोयर ने व्यासजी का स्वागत किया। इस अवसर पर प्रा एस एन निखाडे, प्रा आर बी उपरे, प्रा राजदीप,शिक्षकेत्तर कर्मचारी श्रीमती पद्मा भोयर, वैष्णवी कायरकर, अजय बोबडे उपस्थित थे।

     व्यासजी ने छात्रों से कहा आपको भविष्य में रोगीयों के रोगोंका निदान करके उन्हें स्वास्थ्य लाभ देना है। उसके लिए आपको अपना स्वास्थ्य तंदुरुस्त रखना आवश्यक है। 

 व्यासजी ने आयुर्वेद का संक्षिप्त इतिहास बताते हुये कहा , हमारा आयुर्वेद शास्त्र अनादि काल से है। जबसे मानव ने प्राकृतिक भोजन को छोडकर अग्नि पर पकाया हुआ मसालेदार भोजन खाना प्रारंभ किया तब से बिमारीयों का कष्ट भोगने लगा । तब अश्विनीकुमार देवता ने चिकित्सा ज्ञान विकसित किया। बाद में समुद्र मंथन से धनवंतरी भगवान प्रगट हुये। फिर महर्षि चरक और महर्षि सुश्रृत ने आयुर्वेद को विकसित किया। आज चरक संहिता और सुश्रृत संहिता का अध्ययन किये बगैर आयुर्वेद का अध्ययन पूर्ण नही हो सकता।

  व्यासजी ने कहा हमारी जिभ को रसना कहते है। इस रसना को वाणी और रसास्वादन दोनों बहुत प्रिय है। इन दोनों के प्रयोग में जिव्हा को नियंत्रण में रखना चाहिए। अन्यथा यह रोग और संकट दोनों उपस्थित कर देती है। आहार पर नियंत्रण रखने और दिनचर्या को व्यवस्थित रखने वालों का स्वास्थ्य तंदुरस्त रहता है। और वाणी पर नियंत्रण रखनेवालों की मानसिकता तंदुरुस्त रहती है। मानसिक रोगों से बचाव होता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here